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उस रात मैंने लॉकडाउन को नहीं, बल्कि अपनी किस्मत को हराया

  • Posted: Sunday, June 14, 2026 12:13 PM
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तो बात है 2021 की। दिल्ली में दूसरी लहर का डर था, लेकिन मैं बोरियत से पागल हो रहा था। नौकरी थी नहीं, तीन महीने से घर पर बैठा था। दोस्तों से बात करता, तो बस “कोई ट्रिप प्लान करो” की रट लग जाती। बस, एक रात रोशनी चली गई। मोबाइल डाटा था, पॉवर बैंक था, और पूरा अकेलापन था।

तभी एक पुराने कॉलेज फ्रेंड—जो मुझसे कम टेंशन लेता था—ने मैसेज किया: “यार, तू जुआ नहीं खेलता?” पहले तो मैंने हंसी में टाल दिया। लेकिन बोरियत एक बेहद क्रूर चीज़ है। उसने मुझे एक लिंक भेजा, और मैंने सोचा—बस देखता हूँ, दिमाग की बैटरी निकालने के लिए।

उस साइट पर एक बहुत बड़ा ऑफर लिखा था, मुझे साफ याद है, जैसे आज पढ़ रहा हूँ: Vavada sign up bonus —अलग से शोर मचा रहा था। मैंने सोचा, फर्जी नंबर डालकर देखता हूँ। क्या होगा? मैंने अपना मोबाइल नंबर डाला, ईमेल कुछ भी टाइप किया। और फिर मैं अंदर घुसा। दोस्तों, मुझे पहली बार ऐसा लगा जैसे किसी दूसरे ग्रह पर उतरा हूँ। गेम्स इतने बेहूदा रंग-बिरंगे थे कि आँखें मिचने लगीं।

मैंने पचास रुपये डाले। बस एक कप चाय के बराबर। वो तीसरे ही दिन याद रखना, मैंने स्टार्ट किया उन मामूली स्लॉट्स से, जहाँ कैंडीज गिरती हैं। दस-पंद्रह मिनट तक तो उतना ही आता-जाता रहा। लेकिन फिर एक गेम में ऐसा कुछ हुआ कि मैं लगभग कुरसी से गिरा ही था। एक-एक कर लाइनें जुड़ने लगीं। प्रति लाइन अलग बोनस। मेरी ₹50, अचानक ₹1500 हो गई थी। पसीना आ गया, सच में।

एक रूम था मेरा, पंखा बंद, मोबाइल की रोशनी में मेरा चेहरा डरा हुआ था। तब मैंने जुआरी वाली गलती की—रुकना चाहिए था, पर नहीं। दौड़ जारी रखी। अगले सात-आठ मिनट में सब उड़ गया। सिर्फ ₹87 बचे थे। मैं उठके पानी पीने गया, और सोचा—अंधेरे कमरे में बैठा अपनी कमाई जला रहा हूँ।

लेकिन फिर याद आया, उसी प्लेटफॉर्म पर एक नोटिफिकेशन था। कि हर नए डिपॉजिट पर कुछ मिल रहा था। मैंने फिर से वही बटन दबाया, और ध्यान से पढ़ा: Vavada sign up bonus — पर मैंने sign up तो कर लिया था, लेकिन बोनस को क्लेम नहीं किया था, क्योंकि मैंने टी एंड सी को स्किप कर दिया था। मैंने कोशिश की—हाँ, फ्री स्पिन मिल गए। अब बिना रुपए लगाए। बस बोनस मनी से।

मैं पूरी तरह शांत हो गया। अब अंधेरा नहीं लग रहा था। मैंने सोचा, “देखते हैं इस फ्री मनी का क्या होता है।” फ्री स्पिन में मुझे कोई उम्मीद नहीं थी, मगर किस्मत को अजीब टाइमिंग पसंद है। तीन स्पिन बाद बम बज गया। असली पैसे में बदल गया, कोई 4,200 रुपये। मैं जोर से चिल्लाया, “मां शारदे!”

लेकिन मैं अपने पुराने पापों को दोहराना नहीं चाहता था। मैंने तुरंत विड्रॉल का बटन दबाया। UPI आई, एक मिनट लगा। जब रुपए आ गए, तो मैंने देखा कि बस पचास रुपए लगाए थे, और करीब 35 गुना निकाल लिए थे। हैरानी यह थी कि मेरे दिल में कोई लालच नहीं बचा था। बस एक अजीब सी खुशी थी—ऐसी जैसे बिना वजह उपहार मिल गया हो।

बाद में उस प्लेटफॉर्म पर नियमित आना हो गया, लेकिन एक नियम बना रखा। हफ्ते में दो बार, सौ रुपये से ज्यादा नहीं। मैंने अपनी अलग आईडी बनाई, जहाँ मैंने पूरे गर्व के साथ उन लोगों को बताया, जो पूछते थे, कि ये सब Vavada sign up bonus जैसी स्मार्ट चीजों के दम पर शुरुआत में बिना डरे सीख सकते हैं।

लेकिन असली कहानी यह नहीं है। असली कहानी तब शुरू होती है, जब उसी पैसे से मैंने अपनी भतीजी के लिए कुछ पेंट्स खरीदे। वो ऑनलाइन पढ़ाई से परेशान हो गई थी, मैंने उसे आर्ट किट दिलाई। मैंने माँ के लिए ऑर्डर किया—बिना डिलीवरी चार्ज की टेंशन के। वो छोटे-छोटे सर्कस के चेहरे खिल उठे। मुझे लगा, पैसा जीतना अच्छा था, लेकिन उसे किसी के काम आते देखना और भी बेहतर था।

आज मैं बता सकता हूँ कि मैं प्रो नहीं हूँ। मैं वो आदमी हूँ, जिसने बोरियत को एक्सपेरिमेंट में बदला, और एक्सपेरिमेंट से एक असली पल निकला। अब हर बार जब मैं डिपॉजिट करता हूँ, तो खुद से कहता हूँ: “टिकट तो सस्ता है, पर सफर कभी एक्टिव रहता है, कभी सुला देता है।” लेकिन उस रात मुझे जो शांति मिली, वो किसी जैकपॉट से कम नहीं थी। कभी-कभी जीत असली पैसे से ज्यादा, असली एहसास में होती है।

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